Friday, 30 October 2026

चेहरे पे झूठी हँसी की इक चादर ओढ़कर

 तेरी यादों का समंदर आँखों में बहता रहा,

कोई पूछता रहा हाल, मैं चुप्पी से सहता रहा।

तुझे आईना समझकर हमने सीने से लगाया था

तूने तोड़ा भी बेदर्दी से, और दिल न धड़का ज़रा।


चेहरे पे झूठी हँसी की इक चादर ओढ़कर,

महफ़िल में हर बात पे बेवजह मुस्कुराता हूँ,

इतने ज़ख़्म मिले मुझको तेरे आने-जाने से,

मैं खुद से रूठ गया हूँ अब तेरे इस ज़माने से।


तुझे पाकर भी हम ख़ुद को कहाँ बचा पाए,

तेरी चाहत में हम तो सब कुछ गँवा आए!

तेरी आँखों की नमी जो हमसे देखी न जाती थी,

तूने देखा तक नहीं, हम कितना अश्क बहा आए...

हाँ, वफ़ा करके हम अपनी सज़ा बढ़ा आए!


अब शिकायत किससे करूँ इस बेगाने जहाँ में,

खुद को ही खुद से जुदा करके आता हूँ...

इतने ज़ख़्म मिले... तेरे मिलने से...

बस मुस्कुराकर... ग़म छुपाता हूँ...



चेहरे पे झूठी हँसी की इक चादर ओढ़कर

 तेरी यादों का समंदर आँखों में बहता रहा, कोई पूछता रहा हाल, मैं चुप्पी से सहता रहा। तुझे आईना समझकर हमने सीने से लगाया था तूने तोड़ा भी बेदर...