Thursday, 24 September 2026

अंदर से इतना खोखला कर दिया है.

आजकल दिल और दिमाग पर एक अजीब सी ख़ामोशी और भारीपन छाया रहता है। कभी कभी लगता है जैसे पूरी दुनिया आगे बढ़ रही है और मैं कहीं पीछे, बिल्कुल अकेली छूट गई हूँ। इतने लोगों के बीच रहकर भी ऐसा खालीपन महसूस होता है कि मानो कोई सुनने वाला या समझने वाला है ही नहीं।

​अंदर ही अंदर हिम्मत टूटने लगी है खुद को बहुत लाचार और कमज़ोर पाने लगी हूँ। कभी कभी यह घुटन इतनी बढ़ जाती है कि मन में सब कुछ छोड़ देने के मिट जाने के ख्याल आने लगते हैं। दिन तो जैसे तैसे कट जाता है लेकिन रातें और ज़्यादा डराने लगती हैं। नींद में भी चैन नहीं मिलता वही खौफनाक सपने पीछा करते हैं जैसे कोई मुझ पर हमला कर रहा हो मुझे चोट पहुँचा रहा हो। सुबह आँख खुलती है तो दिल घबराया हुआ होता है। समझ ही नहीं आता कि ज़िंदगी अचानक इतनी भारी क्यों लगने लगी है

कभी बैठकर बस यही सोचती रहती हूँ कि इस भरी दुनिया में सच में कोई मेरा अपना नहीं है। चारों तरफ लोग हैं, चेहरे हैं, बातें हैं, पर अंदर एक ऐसा वीराना है जिसे कोई देख नहीं पाता। जब भी किसी अपने की तलाश में आँखें उठाती हूँ, तो हर रिश्ता दूर और बेगाना सा नज़र आता है। यह एहसास दिल को भीतर तक निचोड़ देता है कि अगर मैं चीख़ भी दूँ तो शायद कोई मुड़कर नहीं देखेगा। इसी अकेलेपन ने मुझे अंदर से इतना खोखला कर दिया है कि अपनी ही साँसें एक बोझ जैसी लगने लगी हैं।



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अंदर से इतना खोखला कर दिया है.

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