Wednesday, 21 January 2026

रूह तक सज़्दा-ए-ख़ामोशी में झुक जाती है

बड़े लोगों से ताल्लुक़ नहीं रखना चाहिए…

क्योंकि उनकी बातें रौशनी नहीं, 

अक्सर फ़रेब होती हैं।

हम उन्हें ख़्वाब समझ लेते हैं, 

और खुद को उन्हीं में गुम कर बैठते हैं। 

वो वादे बहुत ऊँचे करते हैं, 

हम अपनी हसरतें ज़मीन पर छोड़ आते हैं। 

हम यक़ीन करते रहते हैं, 

और वो हमें सिर्फ़ एक कहानी समझते हैं। 

जब उम्मीद टूटती है, तो दर्द सिर्फ़ दिल में नहीं होता,

रूह तक सज़्दा-ए-ख़ामोशी में झुक जाती है…




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